ईरान और चीन के बीच बढ़ती नजदीकी अब छिपी नहीं रही। हालिया रिपोर्ट्स इशारा कर रही हैं कि बीजिंग चुपचाप तेहरान को एडवांस हवाई सुरक्षा उपकरण (Air Defense Equipment) की नई खेप भेजने की तैयारी कर रहा है। ये सिर्फ दो देशों के बीच का व्यापार नहीं है। ये मध्य पूर्व (Middle East) में शक्ति संतुलन को पूरी तरह बदलने की एक सोची-समझी चाल है। अगर आप सोच रहे हैं कि चीन ये सब खुलेआम क्यों नहीं कर रहा, तो इसका जवाब बहुत सरल है। बीजिंग पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से बचना चाहता है और साथ ही ईरान को अपना सबसे मजबूत मोहरा बनाए रखना चाहता है।
ईरान इस समय चारों तरफ से दबाव में है। इजरायल के साथ बढ़ता तनाव और अमेरिका की कड़ी निगरानी ने तेहरान को अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए मजबूर कर दिया है। चीन इसी मजबूरी का फायदा उठा रहा है। वो जानते हैं कि अगर ईरान की हवाई सुरक्षा अभेद्य हो गई, तो इस क्षेत्र में किसी भी बड़े सैन्य ऑपरेशन की कीमत बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी। ये खबर सिर्फ डिफेंस एक्सपर्ट्स के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इससे ग्लोबल ऑयल सप्लाई चेन और सुरक्षा समीकरण दोनों ही प्रभावित होंगे। Meanwhile, you can explore related developments here: The Islamabad Framework: Strategic Architectures of the US-Iran Ceasefire.
ड्रैगन की ये खामोश मदद क्या खेल खेल रही है
चीन हमेशा से 'पर्दे के पीछे' रहकर काम करने में माहिर रहा है। ईरान को जो उपकरण भेजे जा रहे हैं, उनमें एडवांस रडार सिस्टम और एंटी-एयरक्राफ्ट मिसाइल टेक्नोलॉजी शामिल होने की बात कही जा रही है। ये कोई साधारण हार्डवेयर नहीं है। ये सिस्टम इस तरह डिजाइन किए गए हैं कि वे दुश्मन के स्टील्थ विमानों और ड्रोन को भी पकड़ सकें।
ईरान के पास पहले से ही अपना घरेलू डिफेंस सिस्टम है, लेकिन उसमें तकनीकी कमियां हमेशा से रही हैं। चीन की मदद उन गैप्स को भरने के लिए है। बीजिंग का मकसद साफ़ है। वो चाहता है कि ईरान इतना ताकतवर बना रहे कि अमेरिका को इस इलाके में उलझाकर रखा जा सके। जब अमेरिका यहाँ व्यस्त रहेगा, तो चीन के पास इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का खुला मैदान होगा। इसे 'प्रॉक्सी डिफेंस' कहना गलत नहीं होगा। To explore the bigger picture, check out the excellent article by The Guardian.
रूस और यूक्रेन युद्ध से क्या सीख रहा है चीन
चीन और ईरान के इस लेन-देन को समझने के लिए हमें यूक्रेन की जंग पर नजर डालनी होगी। वहाँ हमने देखा कि कैसे सस्ते ईरानी ड्रोन्स ने रूस को बड़ी मदद पहुँचाई। अब चीन उसी एहसान का बदला चुका रहा है या यूँ कहें कि वो इस पार्टनरशिप को अगले लेवल पर ले जा रहा है। चीन ने देखा है कि कैसे एक मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम किसी भी आधुनिक वायुसेना के घमंड को तोड़ सकता है।
ईरान को आधुनिक रडार और इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर उपकरण देकर चीन असल में एक टेस्ट बेड तैयार कर रहा है। वो देखना चाहता है कि उसके बनाए सिस्टम पश्चिमी देशों के अत्याधुनिक फाइटर जेट्स के खिलाफ कितने प्रभावी हैं। ये एक तरह का रियल-टाइम डेटा कलेक्शन है। चीन को इसमें दो फायदे दिखते हैं। पहला, उसे बिना सीधे युद्ध में उतरे पश्चिमी तकनीक की कमजोरी पता चल जाती है। दूसरा, ईरान जैसा एक पक्का और कर्जदार दोस्त मिल जाता है जो जरूरत पड़ने पर ऊर्जा की सप्लाई सुनिश्चित कर सके।
इजरायल की चिंता और रडार की जंग
इजरायल के लिए ये स्थिति किसी बुरे सपने जैसी है। इजरायली वायुसेना दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक मानी जाती है, लेकिन अगर ईरान के पास चीनी रडार सिस्टम आ गए, तो 'सर्जिकल स्ट्राइक' करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। ये रडार सिस्टम काफी एडवांस हैं और ये सिग्नल जाम करने वाली तकनीकों के खिलाफ भी काम कर सकते हैं।
ईरान को मिलने वाली नई खेप में संभवतः ऐसे सेंसर्स हैं जो छोटे से छोटे ड्रोन और क्रूज मिसाइलों को भी ट्रैक कर सकते हैं। इसका मतलब है कि भविष्य में अगर कोई टकराव होता है, तो ईरान का आसमान इतना सुरक्षित होगा कि हमलावरों को भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। ये रणनीतिक बढ़त ही चीन ईरान को तोहफे में दे रहा है।
प्रतिबंधों के बावजूद कैसे हो रही है ये सप्लाई
अक्सर लोग पूछते हैं कि जब इतने सख्त ग्लोबल प्रतिबंध (Sanctions) हैं, तो ये सब कैसे मुमकिन है? चीन ने इसके लिए एक बहुत ही जटिल नेटवर्क बनाया है। वो सीधे सरकारी कंपनियों के बजाय छोटी-छोटी शेल कंपनियों का इस्तेमाल करता है। ये उपकरण अक्सर 'सिविलियन यूज़' या 'इंडस्ट्रियल रडार' के नाम पर भेजे जाते हैं।
कंटेनर शिप्स के जरिए होने वाला ये व्यापार अक्सर तीसरे देश से होकर गुजरता है। कभी-कभी ये सामान मलेशिया या मध्य एशिया के रास्तों से ईरान पहुँचता है। चीन की ये 'शैडो इकॉनमी' इतनी मजबूत है कि पश्चिमी खुफिया एजेंसियां सिर्फ अंदाज़ा लगा पाती हैं, लेकिन पुख्ता सबूत जुटाना और उन्हें रोकना बहुत मुश्किल हो जाता है। ये सब कुछ डॉलर के बजाय युआन या फिर सीधे कच्चे तेल के बदले हो रहा है, जिससे बैंकिंग सिस्टम की निगरानी से बचा जा सके।
क्या ये सिर्फ शुरुआत है
विशेषज्ञों का मानना है कि ये तो बस ट्रेलर है। चीन और ईरान के बीच 25 साल का एक बड़ा समझौता पहले ही हो चुका है। इसके तहत चीन ईरान में अरबों डॉलर का निवेश करेगा। रक्षा उपकरण उसी समझौते का एक छोटा सा हिस्सा हैं। आगे चलकर हम ईरान के सैन्य अड्डों पर चीनी विशेषज्ञों की मौजूदगी भी देख सकते हैं।
ईरान के लिए ये अस्तित्व की लड़ाई है। उसे पता है कि बिना किसी महाशक्ति के समर्थन के वो टिक नहीं पाएगा। रूस खुद जंग में फंसा हुआ है, इसलिए चीन ही एकमात्र विकल्प बचता है। चीन भी इस मौके को हाथ से नहीं जाने देना चाहता। वो जानता है कि ईरान को मजबूत करना मतलब पश्चिम की नाक में दम करना है।
पश्चिम की चुप्पी के मायने
अभी तक अमेरिका और उसके सहयोगियों ने इस पर कोई बहुत बड़ा एक्शन नहीं लिया है। इसकी एक वजह ये है कि वो सीधे चीन से नहीं टकराना चाहते। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच का तनाव पूरी दुनिया को मंदी में धकेल सकता है। लेकिन पर्दे के पीछे कूटनीतिक दबाव बनाया जा रहा है।
चीन को ये समझ आ गया है कि अब दुनिया बदल चुकी है। अब जंग सिर्फ मोर्चे पर नहीं, बल्कि सप्लाई चेन और टेक्नोलॉजी के जरिए लड़ी जा रही है। ईरान को दिए जा रहे ये हवाई सुरक्षा उपकरण सिर्फ हथियार नहीं हैं, ये बीजिंग का दुनिया को एक मैसेज हैं कि वो अब अपनी शर्तों पर ग्लोबल पॉलिटिक्स तय करेगा।
अगर आप इसे एक बड़ी तस्वीर में देखें, तो चीन धीरे-धीरे अपना एक अलग गुट बना रहा है। इसमें रूस, ईरान और उत्तर कोरिया जैसे देश शामिल हैं। ये सभी देश किसी न किसी तरह से पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। चीन इन सबको जोड़कर एक ऐसा विकल्प तैयार कर रहा है जो अमेरिका की दादागिरी को चुनौती दे सके।
इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी नजर रखने की जरूरत है। ईरान को मिलने वाली हर नई मिसाइल और हर नया रडार मध्य पूर्व में युद्ध की संभावना को और करीब ला रहा है या शायद उसे टाल रहा है, क्योंकि अब हमला करना पहले जैसा आसान नहीं रहेगा। आपको ये समझना होगा कि सुरक्षा के नाम पर हो रही ये मदद असल में दुनिया को एक नए और खतरनाक कोल्ड वॉर की तरफ धकेल रही है।
अपनी सुरक्षा को लेकर जागरूक रहने वाले देशों को अब अपनी रणनीति दोबारा बनानी होगी। सिर्फ ताकतवर होना काफी नहीं है, अब ये देखना होगा कि आपके दुश्मन के पास किसका साथ है। चीन की ये 'चुपके-चुपके' वाली मदद अब शोर मचाने लगी है और इसकी गूँज वाशिंगटन से लेकर तेल अवीव तक सुनाई दे रही है। आने वाले कुछ महीनों में हमें इसके और भी नतीजे देखने को मिलेंगे, जब ये उपकरण पूरी तरह से ईरान की सुरक्षा प्रणाली का हिस्सा बन जाएंगे।